मंगलवार, 15 नवंबर 2016

सेक्युलर मसीहा होने की जंग

राजनीति का वर्तमान हमेशा उसका भविष्य तय करता है और अच्छा या बुरा अलग बात मगर ये भी देखने लायक होता है कि कहा क्या हुआ? कैसे हुआ और किसने किया ,अगर 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाये जाने के बाद से उत्तर प्रदेश की राजनीति के बदलाव की बात करें तो शायद उस वक़्त के अलावा कोई वक़्त हमारें उत्तर प्रदेशीय इतिहास में ऐसा होगा जो शायद राज्य को इतना बदल दे.

1992 के बाद कल्याण सिंह यूपी की सत्ता से उतर चुके थे, और तब पूर्ण रुप से उभार हुआ था यूपी के भविष्य के दो नेताओं का यानी धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव और बहन जी कुमारी मायावती जी, और इत्तेफाक़ से दोनों दलितों ,पिछड़ों और मुसलमानों की राजनीति करते और 1993 में दोनों ने मिलकर सरकार भी चलायी,मगर 1993 से लेकर 2016 तक कितने ही चुनाव आये और गऐ,मगर मुसलमानों को क्या मिला?

मायावती जी चार बार उत्तर प्रदेश की गद्दी पर काबिज़ हो चुकी है और मुलायम सिंह जी भी लगभग इतनी ही बार यूपी फतह कर चुके है ,और 'मौलाना' बने मुलायम और "तिलक तराज़ू तलवार इनको मारो जूते चार" का नारा दे चुके ये दोनों नेता बिना मुस्लिम वोट के कुछ भी नही है, लेकिन फिर भी ये दोनों मुसलमानों को "सेक्युलरिज़्म" की ज़िम्मेदारी देकर भाजपा की तरफ क्यों चले जाते है? माया जी भाजपा के साथ सरकार बना चुकी और मुलायम जी बाबरी मस्जिद विध्वंस के वक़्त के मुख्यमंत्री को पार्टी ने जोड़ चुके है.

अब सवाल ये है कि यूपी में सेक्युलर राजनीति के तीन बड़े सूरमाओं से दो का हाल आपके सामने है,और राजनैतिक पंडितों की खिचड़ी विधानसभा वाली बात भी आपके सामने है तो बताइये क्या ये दोनों में से कोई भी भाजपा के साथ नही जायेंगे इसकी कोई ज़िम्मेदारी लेगा? और अगर नही ले सकता है तो केसा सेक्युलरिज़्म?  हो सकता है कथित मुस्लिम रहनुमाओं की भीड़ के पेट में इस बात से दर्द हो सकता है लेकिन आख़िर वो कैसे भविष्य के वर्तमान से भाग सकेंगे? मगर ये सियासत है साहब यहा दाग़ धूल भी जाते है.

अब गाहे बगाहे हो या नही यूपी की सेक्युलर राजनीति का मसीहा बनने की ही जंग तो है, जो आज भी बहन जी सिर्फ भाजपा का डर ही दिखा रही है, और सत्ताधारी सपा दूसरी बार भी 'महागठबंधन' को बनते बनते भूल गयी और कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी, बाकी वर्तमान का इतिहास क्या कोई सरीखा गठजोड़ लाता है ये देखना होगा..

असद शैख़

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