दीदी, शाबाश, जी हां बंगाल की मुख्यमंत्री,तृणमूल कोंग्रेस की अध्यक्ष और पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी को मेने शाबाश इसलिए कहा क्योंकि नोटबन्दी के मसले पर विपक्षी दल के तौर पर सबसे मुखर तौर पर और दो टूक बोलने की हिम्मत अगर किसी ने करि है तो वो है दीदी, ममता बनर्जी ने ही केंद्र सरकार के नोटबन्दी फैसले के ख़िलाफ़ संसद के बाहर एक विरोध मार्च निकलवा कर एक माहौल बना कर विपक्ष होने की हिम्मत दिखायी,और ये बात इसलिए भी अहम है क्योंकि विपक्ष होना लोकतंत्र की पहचान है.
पूर्व रेल मंत्री और वर्तमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उस मार्च तक ही नही रुकी उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री के साथ आजादपुर मंडी में संयुक्त रैली कर नरेंद्र मोदी को एकतरफ़ा चुनौती देकर नोटबन्दी के फैसले को वापस लेने की बात कही, जो केंद्र सरकार के लिए अच्छी भली चुनौती भी है,मगर बात सिर्फ इतनी ही नही है बात कुछ और भी है कि आखिर दीदी क्यों केंद्र पर इतना ध्यान दे रही है? कही ये वो खिचड़ी तो नही जो 2019 में बनेगी?
अगर बात दीदी के ऐतिहास से लेकर वर्तमान की करें तो बंगाल में लेफ्ट के 34 साल के किले को ध्वस्त कर बंगाल पर काबिज़ होने वाली 'माँ,माटी और मानुष' का नारा देने वाली ममता दी केंद्र में 'रेल मंत्री' भी रह चुकी है और हो न अब दीदी शायद 'दिल्ली' जाना चाहती है और इसी के लिए वो जद्दोजहद में लगी है,लेकिन ध्यान करने वाली बात ये है कि राजग और यूपीए दोनों की सरकार में मंत्री रही ममता दी अपने मौजूदा 44 सांसदों के साथ दिल्ली तक पहुंच पाएंगी क्या?
लेकिन अगर आज बात बीजेपी के खिलाफ 2019 के चुनावों में खड़े होने वाले नेताओं की बात करें तो दीदी उसमे अव्वल है,और कमज़ोर होती कोंग्रेस के बदले में आने वाले वक़्त में जिस तीसरे या चौथे मोर्चे की सुगबुगाहट राजनेतिक गलियारों में है उसमें ममता दी बहुत मजबूत है, और हो न हो दीदी भी यही सोच रही है,इससे भी ज़्यादा ममता बनर्जी की साफ और बेबाक़ बोलने वाली छवि भी 2019 में मोदी जी के बड़े रुप के सामने टिकती हुई नजर आएंगी और वर्तमान जैसे 20 से 25 दलों के गठबंधन के साथ ही सही लेकिन देश के लिए एक नया विकल्प शायद दे पाए.
लेकिन ये तो पूर्वानुमान ही है मगर एक बात तो है नोटबन्दी के खिलाफ बोलने वालों के लिए दीदी ला साथ ऑक्सिजन जैसा है मगर बंगाल की दीदी दिल्ली में बिना "7 आरसीआर" की चाहत के मुश्किल ही बोलेंगी,इसलिए दोनों चीज़ों को साथ देखना बेहद ज़रूरी है.
असद शैख़
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