एक तस्वीर कल टीवी पर नज़र आई,साथ साथ सोशल मीडिया पर भी तैर गयी तस्वीर थी मौलाना जावेद आब्दी राज्यमंत्री उत्तर प्रदेश सरकार को धक्का देते सपा उत्तर प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव की, मामले पर अगर नज़र ड़ालें तो वो शिवपाल और अखिलेश की आपसी कलह की हों सकती है,लेकिन क्या एक राज्य मंत्री एक कद्दावर नेता को शिवपाल जानते नही या जानते भुझते ऐसा किया?
देखिये वजह कुछ भी हो लेकिन ये धक्का हक़ीक़त है उत्तर प्रदेश के मुसलमान की और ये उसी कड़ी का हिस्सा है जहाँ मुसलमानों का मनोबल उसके बड़े नेता के ज़रिये गिरा कर या उन्हें गलत तरह इस्तेमाल कर पूरे के पूरे समुदाय को तोड़ना, बरहाल आप या फिर सपाई यानि सपा के नमक हलाल नेता उस तस्वीर को देखने के बाद उसे जस्टिफाई कर कुछ भी कहें लेकिन हक़ीक़त कुछ और ही है।
सपा के लगभग 5 साल के कार्यकाल में कितने अद्भुत विकास हुए मुझे याद नही लेकिन मुझे जो याद है वो है डीएसपी ज़ियालुहक़ की हत्या,मुज़फ्फरनगर दंगा ,दादरी हत्यकांड या अन्य सैकड़ों दंगे लेकिन इसमें सबसे गौर करने की बात है मुज़फ्फरनगर दंगा जहा ठंड से सिकुड़ते दंगा पीड़ितों को "नेताजी" ने कांग्रेस और बीजेपी का एजेंट कहा था,वो लम्हा सबसे ज़्यादा गौर करने वाला है,यूपी के मुस्लिमों को उनकी हक़ीक़त जाने लेने की।
लेकिन फिर भी ऐसा ही चला असल में मुस्लिमों का माइंड सेट ऐसा कर दिया है कि बीजेपी के अगेंस्ट कुछ भी कहेगा और इसके पीछे की वजह डीयू में रिसर्चर और राजनीतिक विज्ञानं में पीएचडी कर चुकी डॉक्टर शगुफ्ता वो कहती है कि "मुस्लिमों को ऐसा कर दिया गया कि तुम राजनीतिक रहनुमा बना ही नही सकते हो, और तुम्हे 'सेक्युलर' दिखने के लिए बीजेपी के खिलाफ वोट करना ही होगा" ये बात काफी है बताने के लिए।
ऐसा ही कुछ कांग्रेस करती आई है और सपा और बसपा कर रही है या और अन्य दल कर रहे है, और कथित तौर पर मुस्लिम परस्त बनने के लिए ये सेक्युलर दल मुस्लिम नाम वाले नेताओं को तलाशते है और जिस मर्ज़ी चाहे इस्तेमाल करते है,अब अगर जावेद आब्दी की बात पर दोबारा पहुंचे तो उनके ग्रह क्षेत्र में उनकी क्या हैसियत रह जायेगी इस बेइज़्ज़ती के बाद वहां के मुस्लिम किसी और को चुनेंगे और फिर वो 5 साल तक इसी तरह एक गड़रिये की तरह अपने इलाके की भेड़ों(मुस्लिमों) को संभालेगा।
मगर बात सिर्फ जावेद आब्दी या उनकी बेइज़्ज़ती को जस्टिफाइ करने के लिए यूपी के आज़म खान,शाहिद मंज़ूर,अतीक़ अहमद या कमाल अख़्तर का नाम लेने सपाई मुस्लिम नेताओं की ही नही है उनके पीछे चल रही भेड़ों की भी है क्योंकि कोई भी राजनैतिक दल जब चाहता है अपनी राजनीतिक ज़रूरत के लिए गड़रिये बदल लेता है लेकिन अफ़सोस वो भेड़ बन चुके मुसलमान वही चलते है।
अब जावेद आब्दी साहब को दिए गए धक्के की या करि गयी बेइज़्ज़ती के बावजूद स्टेज पर खड़ा रहने की वजह जानने से बहतर है अच्छा विकल्प तलाशना,बेहतरी और अम्नपरस्ती का रास्ते चुन राजनीतिक हालात भी बनाना लेकिन अभी ये बहुत दूर की सी बात है...
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