समाज की अपंग सोच के ख़िलाफ़ आज एक साथ खड़ा होने की ज़रूरत है,चाहें वो जातिवाद,साम्प्रदायिकता हो या नफ़रत का भाव हो क्योंकि कोई भी बुराई तक तक खत्म नही हो सकती जब तक हम उसे खत्म न करना चाहे. धर्म के नाम पर दंगे,मौत और आगज़नी ऐसे ही नही होती इसके पीछे एक पूरी रणनीति तैयार रहती है और इसकी वजह से ही एक बार में खत्म हो जाने वाला मामूली सा मामला एक भयावह रूप ले लेता है और एक बड़ी त्रासदी पीछे छोड़ देता है।
यदि मुद्दे पर बात करें तो 1857 के बिगुल के समय हिन्दू-मुस्लिमों ने मिल कर गाय और सूअर की चर्बी को मुंह से न चबाने के आह्वान पर और मंगल पाण्डेय की अध्यक्षता में एक ऐसा आंदोलन छेड़ दिया था , जिसने अंग्रेज़ो के दांत खट्टे कर दिए थे और ये सब आपस में लड़ कर नही एक दूसरे के धर्म का ध्यान रख कर,एक दूसरे की आस्था का ख्याल रख कर और साथ साथ होकर अंग्रेज़ो से लड़ाई लड़ी थी, अब वक़्त है एक और लड़ाई का और वो है सांप्रदयिकता से लड़ाई .
अगर हम अपने धार्मिक मुद्दों को सरकार और सियासी पार्टियों से दूर रखेंगे तो कोई भी ऐसा मसला नही है जिसे हम सुलझा न सके. यहा तक की एक दूसरे की आस्था का ख़याल रखने का भी ये एक बेहतरीन तरीक़ा है,लेकिन हम बस यही गलती कर जाते है और अपने धार्मिक मुद्दों को राजनेतिक पार्टियों भुनाने की कोशिश में लग जाती है , बल्कि हमे हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास से सीखना चाहिए की कैसे हिन्दू-मुस्लिमों को साथ जोड़ कर आपसी मोहब्बतों को वो बढ़ाते थे...
मगर ऐसा करने के लिए हम बेहद समझदारी से,मोहब्बत से,ख़ुलूस से काम करना होगा एक दूसरे की आस्था का ख़याल रखना होगा, समाज में बराबरी पैदा करनी होगी और जो कोई भी समाज को तोड़ने की और बांटने की बात करता मिलेगा उसके खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठानी होगी।
यदि हम ऐसा करने में सक्षम हुए तो ज़रूर बहुत जल्द हम सरकारों से अपने हक़ की,ज़रूरतों के सवाल कर पाएंगे वरना सरकारें और सियासी दल हमारी कमज़ोरी जान चुके है वो उसी पर प्रहार करेंगे।।...
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