सोमवार, 30 जनवरी 2017

मर्ज़ी आपकी है.....

यूपी चुनाव की जाति क्या है? यूपी का धर्म क्या है? यादव,ब्राह्मण,बनिया,ठाकुर,वैश्य और यूपी का धर्म क्या है हिन्दू,मुस्लिम,सिख या जैन? पता नही इनमे से कोई भी चीज़ पुरे उत्तर प्रदेश पर एक साथ रुक सकती है,या थम सकती है या रह सकती है या फिर किसी भी एक जाति का या एक धर्म का राज उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में हो सकता है? कभी नही हो सकता और इस बात को सबसे ज़्यादा अच्छे से वहां के राजनेता जानते है और समझते है  और यही वजह है कि पिछले 30 से 40 साल से उत्तर प्रदेश की जनता इसी चक्रव्यूह में फंसी भी है,लेकीन क्या इस सब के लिये महज़ नेता ही ज़िम्मेदार है? नही बिलकुल ऐसा नही है.

उत्तर प्रदेश में भरी पूरी आबादी है,विविधता है ,गांव है दूर दूर देहात है एक जिलें में इलाके है वहाँ शहर है,गांव है तालुके है और उसी में जाति है,उसी धर्म है और इन्ही सब मे लोग है,और यही से राजनीति शुरू होती है,अगर मोटे तौर पर इस जातिगत राजनीती या धर्मवादी राजनीती की बात करें तो हमे नज़र आएगा की तमाम राजनितिक पार्टियां हर क्षेत्र के हिसाब से अपने अपने प्रत्याशी तय करती है,मिसाल के तौर पर मेरठ शहर विधानसभा की बात करें तो नज़र आएगा की वहां मुस्लिम समुदाय के साथ,पंजाबी और बनिया आबादी के साथ ब्राह्मण आबादी भी है तो गौर करें भाजपा के यहां से प्रत्याशी लक्ष्मीकांत वाजपयी है जो "ब्राह्मण" है,बसपा के यहां से प्रत्याशी पंकज जॉली है जो "पंजाबी" है और सपा के यहां से प्रत्याशी "रफ़ीक़ अंसारी" है जो मुस्लिम है, यानि कुल मिलाकर तीनों मुख्यों दलों ने अपना जातिगत,धार्मिक दांव पूरी तरह खेला है.

चलिये ये तो बात राजनितिक पार्टियों की लेकिन क्या वहां के वोटर्स भी जाति,धर्म देख कर वोट नही करते है,राजनितिक पार्टियों से ज़्यादा ये आबादी भी तो कहीं जातिवादी,धर्मवादी नही? भरे दिल से ही मानिये लेकिन ये सच है,उत्तर प्रदेश की जनता का बड़ा हिसा और उन लोगों की मेन्टलिटी बिलकुल साम्प्रदायिक हो गयी है,जातिवादी हो गयी है और अगर ऐसा नही है तो क्यों मायावती जो "तिलक तराज़ू और तलवार" जेसा उत्तेजक नारा देकर भी "हाथी नही गणेश है" कहकर ब्राह्मण प्रत्याशी उतार कर ब्राह्मणों की सगी हो गयी? कैसे "सबका साथ सबका विकास" कहने वाली भाजपा पुरे उत्तर प्रदेश में भरी पूरी मुस्लिम आबादी होने के बावजूद भी एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में न उतार कर तमाम "सेक्युलर" लोगों को सगी हो गई? कैसे नाम के आगे बडा बड़ा "यादव" लिखने वाली सपा सबकी सगी ही गयी? शायद इन बातों का जवाब देते हुए लोग बगलें झाँकने लगे और बात घुमा दे लेकिन ये सच है,कोरा सच.

अंत में बस ये की अगर जातिं,धर्म और यहां तक की क्षेत्र की बात अब भी अगर दिमाग में लेकर यूपी की जनता वोट करेगी तो अपने इलाके की बदहाली की,अशिक्षा की,समस्याओं की ज़िम्मेदारी उन तमाम लोगों की होगी जो जाति ,धर्म,क्षेत्र देख कर वोट करते है न की राजनैतिक दलों की गलती,या फिर जनता अपने मुद्दों को लेकर वोट करें और फिर हर पार्टी,हर दल से जवाब मांगे जब शायद बेहतरी नज़र आये,वरना जैसा जनता चाहें करें मर्ज़ी उनकी है....

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